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Napoo healing कोर्स में आपका स्वागत है |

कुछ वर्ष पहले तक ऐसा माना जाता था कि बुरी नज़र, टोने-टोटकों, मंत्रघात, श्राप और प्रेतात्माओं का रहस्यमयी ज्ञान और इनसे सम्बंधित समस्याओं का उपचार केवल किसी ऐसे व्यक्ति के पास है जो तांत्रिक क्रियाएं जानता है | अदृश्य होने के कारण नकारात्मक शक्तियां और इनसे सम्बंधित समस्याओं के बारे में सम्पूर्ण लिखित जानकारी उपलब्ध नहीं होने के कारण और डरावने प्रचार के कारण, पीड़ित व्यक्ति को अपना उपचार करने में अति कठिनाई और पीड़ा का सामना करना पड़ता था परन्तु अब ऐसा नहीं है |

Napoo Foundation, New Delhi, INDIA ने सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा, नकारात्मक शक्तियों, नकारात्मकता, नज़र लगना (कुदृष्टि), मंत्रघात, टोने-टोटके और भूत-प्रेत इत्यादि के भय-रहित उपचार पद्धति सिखाने के लक्ष्य से Napoo Healing Course (पाठ्यक्रम) आरंभ किया है | Napoo foundation के संस्थापक श्री विजय बतरा जी ने कई सालों तक तत्व विज्ञान की खोज करके इन रहस्यमयी समस्याओं के आधार पर ऐसी तत्व उपचार पद्धति विकसित की है जो यह सुनिश्चित करती है कि किस समस्या के लिए कौन सा तत्व (अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी या आकाश) कितनी मात्रा और किस प्रकार से प्रयोग करना है | Napoo healing विश्व भर में एकमात्र ऐसी पद्धति है जिसमे नकारात्मक शक्तियों द्वारा उत्पन्न समस्याओं का समाधान अद्वितीय तत्व आधारित पद्धति से किया जाता है |  इस पाठ्यक्रम में सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों का गूढ़ज्ञान और तार्किक विज्ञानं का मिश्रण है जो सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों के प्रभाव को जड़ से समाप्त करके स्थायी लाभ देता है | Napoo Healing अन्य सभी प्रकार की उपचार पद्धतियों और तंत्र क्रियाओं से बिलकुल भिन्न है और उन लोगों के लिए है जो इन समस्याओं से पीड़ित है |

Napoo Foundation का अपने शोध के माध्यम से यह कहना है कि हमारा शरीर पंचतत्वों (अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश) से बना है इसलिए जब किसी व्यक्ति को किसी भी प्रकार की नकारात्मक शक्ति प्रभावित करती है तब शरीर के तत्व असंतुलित हो जाते हैं जो मानसिक, शारीरिक और आर्थिक समस्याओं का कारण बनते है । Napoo पाठ्यक्रम द्वारा व्यक्ति की समस्या के आधार पर यह पता चलता है कि किस समस्या के होने पर शरीर का कौन सा तत्व असंतुलित होता है और उस समस्या का स्थायी समाधान करने के लिए कौन सा तात्विक उपचार करना है जिससे समस्या दोबारा उत्पन्न ना हो | इसके साथ-साथ Napoo पाठ्यक्रम में यह भी ज्ञान है कि दूसरों की नकारात्मक ऊर्जा का हमारे जीवन से किस प्रकार से सम्बन्ध है क्योंकि हमारे जीवन में उत्पन्न होने वाली अधिकतर समस्याएं दूसरों के कारण ही होती है | दूसरों के विचार, दूसरों की गति और दूसरों का स्वभाव, हमारे शारीरिक तत्वों को प्रभावित करके हमारे जीवन को गुप्त रूप से हानि करते है | आइये, इस विषय को समझने के लिए आकाश में चलते है, जिस प्रकार आकाशगंगा में स्थित सभी ग्रह भी अपनी सूक्ष्मकिरणों द्वारा हमारे शरीर के तत्वों को हर समय निरंतर प्रभावित करते रहते है जिससे व्यक्ति को प्रतिदिन नई समस्या का सामना करना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार पृथ्वी ग्रह तथा पृथ्वी पर स्थित सभी जीवों और वस्तुओं द्वारा हमारे शारीरिक तत्व असंतुलित होते रहते है |

शरीर के पाँचों तत्वों को संतुलित करने के लक्ष्य से Napoo Foundation ने वर्ष 2004 में तत्व आधारित Napoo healing therapy (पद्धति) आरंभ की है इस पद्धति से सभी प्रकार के नकारात्मक प्रभाव समाप्त हो जाते है | तत्व आधारित Napoo पद्धति के पीछे मूल अवधारणा यह है कि यदि शरीर के सभी तत्व संतुलित होते हैं तो जीवन में कभी भी कोई समस्या नहीं होती है | Napoo पद्धति के इसी अद्वितीय तर्क और तीव्र तथा सटीक परिणामों के कारण Napoo Healing विश्व भर के लोगों में तेज़ी से प्रचलित हो रही है |

Napoo healing निम्न परिस्थियों में अवश्य करें:

  • हर समय अकारण तनाव होना अथवा डर लगना
  • स्वयं को अकेला, असुरक्षित, असहाय महसूस करना
  • नींद ना आना अथवा सपने में मृतकों को देखना
  • गंदे या डरावने सपने आना अथवा नींद में डर लगना
  • बिना कारण रोना आना या कहीं भागने का मन करना
  • नकारात्मक विचार आना और नकारात्मक क्रियाएं करना
  • किसी व्यक्ति के घर पर आने के बाद अकारण कलेश होना
  • किसी व्यक्ति से मिलने पर शरीर भारी होना या बुखार होना
  • किसी भी वस्तु अथवा व्यक्ति तक पहुँचने में असफल रहना
  • किसी व्यक्ति द्वारा कुदृष्टि लगना, श्राप देना या टोटका करना
  • किसी अदृश्य शक्ति का आभास होना, सुनाई देना या दिखाई देना
  • परिवार सदस्यों में एक दूसरे के प्रति प्रेम और विश्वास में कमी होना
  • घर में सुख समृद्धि की कमी रहना और हमेशा किसी सदस्य का बीमार रहना

Napoo पद्धति द्वारा ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव और बुरी नज़र, टोना-टोटका, मंत्रघात, श्राप, प्रेतात्मा से स्थायी रूप से छुटकारा मिलता है | Napoo पद्धति का किसी धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है यह किसी भी व्यक्ति को उसके धार्मिक या आध्यात्मिक विश्वासों को बदलने के लिए नहीं कहता है और यह पद्धति अन्य सभी प्रकार की वैकल्पिक उपचार पद्धतियों और अनुष्ठानों से बिलकुल भिन्न है |

जिस प्रकार शारीरिक बीमारी की जांच और उपचार के लिए वर्तमान की आवश्यकता के अनुसार अनेकों प्रकार के बदलाव हुए है उसी प्रकार वर्तमान समय में नकारात्मकता, बुरी नज़र, टोना-टोटका, मंत्रघात, प्रेतात्मा सम्बंधित समस्याओं के समाधान के लिए Napoo healing विकसित की गयी है | बुरी नज़र, टोने टोटके, मंत्रघात, प्रेतात्मा, यह सभी अलग-अलग प्रकार की समस्याएं है और इनकी उपचार विधि भी अलग होती है | जिन लोगों को बुरी नज़र बार-बार लगती हो उन पर टोने टोटकों का प्रभाव अधिक और तीव्र गति से होता है | परिवार में किसी एक व्यक्ति पर टोने टोटकों का प्रभाव होने पर यह प्रभाव धीरे धीरे सारे परिवार को हानि करने लगता है |

सभी टोने टोटके गोपनीय तरीके से किए जाते है इसलिए इनसे बचने के लिए सभी उपचार क्रियाएं गोपनीय होनी चाहिए अन्यथा सभी प्रकार के उपायों को करने का लाभ नहीं मिलता | किसी एक प्रकार के नकारात्मक प्रभाव को समाप्त करने के लिए अनेकों प्रकार के मंत्रों, तंत्रों और यंत्रों की आवश्यकता नहीं होती और ना ही नकारात्मक प्रभाव के लिए दैनिक पाठ-पूजा और मंत्रजाप से लाभ  होता है |

किसी भी नकारात्मक शक्तियों से सम्बंधित समस्या के प्रभाव का आंकलन करके ही उसके लिए तत्व प्रयोग करें क्योंकि इसमें तुरंत लाभ के लिए, समय समय पर  उपचार में तत्वों के बदलाव की आवश्यकता हो सकती है |

भाग – १

भूत-प्रेत, टोना टोटका इत्यादि शब्द सुनते ही मस्तिष्क में पहला प्रश्न आता है कि क्या ऐसा भी कुछ होता है और वहीं दूसरी ओर भय की लहर मस्तिष्क में दौड़ने लगती है क्योंकि प्रेत इत्यादि सभी नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव अशुभ और हानिकारक होता है | किसी व्यक्ति अथवा स्थान पर किसी नकारात्मक शक्ति द्वारा पकड़ (प्रभाव) होने के हानिकारक परिणाम ही अनुभव किए जाते है परन्तु सभी प्रेतात्माएं नकारात्मक नहीं होती इनमे बहुत सारी प्रेतात्माएं लाभकारी और सकारात्मक भी होती है, इनमे से कौन सी प्रेतात्मा सकारात्मक है और कौन सी नकारात्मक इसकी पहचान करने के लिए सही ज्ञान और मार्गदर्शक की आवश्यकता है जो इस पाठ्यक्रम में बताई गयी है |

भूत-प्रेत, टोना टोटका इत्यादि के बारे में सही ज्ञान के अभाव के कारण भ्रम और भय फैला हुआ है | यदि प्रेतात्मा के बारे में सही ज्ञान हो तो हानि करने वाली अदृश्य शक्तियां भी लाभकारी हो सकती है | सबसे पहले इस प्रश्न का उत्तर पता होना चाहिए कि क्या ये सब चीज़ें होती भी हैं या केवल भ्रम है तो इसका तार्किक उत्तर यह है कि संसार में  जितना भी कहा, सुना, बोला, अनुभव और विचार किया जाता है वह सभी कुछ संसार में है इसीलिए उसके बारे में वर्णन होता है, जो संसार में उपस्थित नहीं है उसके बारे कोई विचार या वार्ता नहीं होती है | प्रेतात्मा के बारे में कहा, सुना, बोला, अनुभव और विचार किया जाता है इसका सीधा अर्थ है कि प्रेतात्मा होती है |  ऐसे तो मनुष्य ने साकार संसार में बहुत उन्नति कर ली है परन्तु अदृश्य और रहस्यमयी संसार को पूर्ण रूप से समझना आज भी बाकि है क्योंकि इसकी तार्किक और सटीक लिखित जानकारी उपलब्ध नहीं है | संसार के अधिकतर लोगो के पास या तो ज्ञान है या फिर केवल तर्क है, ज्ञान और तर्क, दोनों होने पर ही इस अदृश्य रहस्यमयी संसार को पूर्ण रूप से समझा जा सकता है |

प्रेतात्मा क्या है ?

शरीर की मृत्यु के पश्चात कर्मो के आधार पर आत्मा अगला शरीर धारण करती है, ऐसी आत्मा जो कर्मफल के आधार पर संसार में बिना शरीर के विचरती है उसे प्रेतात्मा कहते है यानी जिस आत्मा को नए शरीर या मोक्ष की प्राप्ति नहीं हुई है वह पृथ्वी पर अदृश्य शक्ति के रूप में विचरती है | आत्मा का प्रेत बनने के अन्य कारण भी होते है जो इस प्रकार है: मृत्यु के समय इच्छा पूर्ण ना होना या किसी से अत्यधिक ईर्ष्या होना, दुर्घटना से अकस्मात् मृत्यु होना या प्राण निकलने में विवश होना, किसी अन्य प्रेतात्मा द्वारा मृत्यु होना या अदृश्य शक्ति के प्रयोग से मृत्यु होना | मृत्यु के समय व्यक्ति का ध्यान और मृत्यु का कारण, दोनों आपस में मेल ना खाने के कारण आत्मा को प्रेत योनि में रहना पड़ता है |

आत्मा का प्रेतात्मा बनना भी अन्य योनियों की भांति ही एक योनि है, शरीर की मृत्यु के बाद से पुनर्जन्म तक का जीवन प्रेत योनि है; अधिकाँश मनुष्य शरीर की मृत्यु के बाद ही आत्मा प्रेत बनती है |  कुछेक प्रेतात्माएं मनुष्य के अतिरिक्त अन्य जीवो की भी होती है परन्तु ऐसा बहुत ही कम होता है | प्रत्येक आत्मा शरीर छोड़ने के बाद अगला शरीर मिलने तक प्रेतात्मा है इसमें मनुष्य से एक सौ गुना अधिक शक्ति और गति होती है | मृत्यु से पहले व्यक्ति का जैसा स्वभाव, व्यवहार और विचार होता है मृत्यु के बाद अगला जन्म मिलने तक आत्मा बनी प्रेतात्मा वैसा ही व्यवहार सौ गुना अधिक करती है । अच्छे स्वभाव वाले व्यक्ति का प्रेत जीवित लोगों के लिए सौ गुना अच्छा कर सकता है और बुरे स्वभाव वाले व्यक्ति के प्रेत में जीवित लोगों के लिए सौ गुना बुरा करने की क्षमता होती है |

एक प्रश्न यह भी है कि आत्मा एक है तो फिर प्रेतात्मा को भूत, प्रेत, जिन्न इत्यादि क्यों कहा जाता है Napoo हीलिंग कोर्स में इस विषय पर सम्पूर्ण ज्ञान उपलब्ध है | प्रेतात्मा अधिकतर स्त्रियों और भावुक व्यक्तिओं को अधिक हानि करती है, जिन व्यक्तियों के पिछले जन्मों के और वर्तमान जन्म के कर्म कमजोर होते हैं उन पर प्रेतात्मा का नकारात्मक प्रभाव अधिक होता है और जिन व्यक्तियों के पिछले और इस जन्म के कर्म मध्यम (बलवान और दुर्बल दोनों प्रकार के) होते है उन पर प्रेतात्मा का नकारात्मक प्रभाव होता है परन्तु ऐसे लोग उनसे बचने में सक्षम होते है या उन्हें बचने का उपाय मिल जाता है | जिन लोगो के पिछले जन्मों के कर्म और वर्तमान जन्म के कर्म बलवान होते है प्रेतात्मा ऐसे लोगों की हानि करने में विफल रहती है |  इसीलिए कहा जाता है कि मनुष्य को सदैव अच्छे कर्म ही करने चाहिए जिससे भूत-प्रेत की समस्या कभी भी ना हो |

मृत्यु के बाद से प्रेत योनि के आरम्भ से सौ वर्ष की आयु तक इसकी किशोरावस्था होती है जिसे प्रेतात्मा कहते है जो मनुष्य से सौ गुना अधिक शक्तिशाली है | जैसे सर्प सौ वर्ष का होने के पश्चात इच्छाधारी हो जाता है और वह कोई भी रूप धारण कर सकता है उसी प्रकार प्रेतात्मा सौ वर्ष का होने पर भूत बन जाती है और यह मनुष्य से एक हजार गुना अधिक शक्तिशाली हो जाता है | भूत, प्रेतात्मा की युवा अवस्था है जो एक सौ वर्ष बाद आरंभ होती है भूत की एक हजार वर्ष तक की आयु है अर्थात भूत एक सौ वर्ष के बाद से ग्यारह सौ वर्ष तक की आयु तक होता है | भूत में मनुष्य से एक हजार गुना शक्ति और गति होती है और अधिकतर भूत केवल क्षति करते है | भूत की हजार वर्ष की आयु होने पर भूत जिन्न बन जाता है,  प्रेतात्मा की वृद्धावस्था को जिन्न कहते है जिसकी आयु दस हजार वर्ष की है, जिन्न में मनुष्य से दस हजार गुना शक्ति होती है जो लगभग सभी कुछ करने में सक्षम होता है |  वृद्धावस्था पूरी करने के बाद इसे पुन: मनुष्य शरीर मिलता है | प्रेत से मनुष्य योनि मिलने तक का पूरा समय ग्यारह हजार एक सौ (१११००) वर्ष है, जिन्न की आयु पूर्ण होने पर इसे स्वत: मनुष्य शरीर मिलता है |

प्रेतात्माएं असंख्य है जो प्राय: देखी, सुनी और अनुभव की जाती है जबकि प्रेत से बनी भूत हजारो में एक प्रेतात्मा ही बनती है क्योंकि इस आयु के भीतर ही जीवित लोगों के द्वारा इनके लिए प्रार्थना, कर्म (कर्मकांड), उपाय इत्यादि समाधान किए जाते है जिसके फल से इनको अगले जन्म(शरीर) की प्राप्ति हो जाती है या फिर इनकी मुक्ति भी हो जाती है | भूत से जिन्न लाखो में एक भूतात्मा ही बनती है इसलिए जिन्न का होना बहुत ही कम सुना जाता है |

स्त्री शरीर की मृत्यु के बाद आत्मा को प्रेतनी, भूतनी और चुड़ैल कहा जाता है | हालांकि प्रेतात्मा का अपना कोई लिंग नहीं है फिर भी अंतिम शरीर के विचार, स्वभाव और आदत के कारण प्रेतात्मा वैसा ही बर्ताव करती है जैसा शरीर उसने छोड़ा होता है | जितने प्रकार के स्वभाव जीव के होते है वही स्वभाव प्रेतात्मा का होता है | कई बार प्रेतात्मा अपना रूप बदल कर भी दिखती है यह प्रेतात्मा की अपनी इच्छा पर निर्भर करता है, प्रेतात्मा केवल उसी रूप में दिखती है जो रूप उसे जीवित शरीर में रहते हुए प्रिय होते है चाहे वह किसी मनुष्य का हो या किसी जीव जंतु का हो | उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति को कुत्ता या बिल्ली पालना पसंद हो तो प्रेत बनने के पश्चात अपने स्वभाव के कारण वह कुत्ता या बिल्ली बन कर दिखना पसंद करता है |

प्रेतात्मा के प्रभाव :

प्रेतात्मा का प्रभाव होने पर लक्षण द्वारा इसका पता चलता है जैसे किसी व्यक्ति पर इसका प्रभाव होने पर व्यक्ति के चहरे की चमक समाप्त हो जाना, समझदार होने पर भी हर कार्य में भ्रमित होना, बिना कारण भय लगना,  हर समय थकान और मस्तिष्क में भारीपन होना, बिमारी होने पर भी पता नहीं चलना, सभी कुछ होने पर भी मन उदास रहना, अकारण रोने का मन करना, मृत लोगो का दिखना या सपने में आना, मृत लोगो या अदृश्य व्यक्ति के साथ सहवास करना, आवाज या शोर सुनाई देना, कसूर ना होने पर भी अपमान होना, ना चाहने पर भी किसी के दबाव में गलत कार्य को ही करना, आत्महत्या करने की इच्छा होना  इत्यादि |

जब इसका प्रभाव कार्यस्थल पर होता है तब कार्यस्थल का आकर्षण कम हो जाना, कार्यस्थल पर ग्राहकों का कम आना, आमदनी और तरक्की में कमी होना, धन हानि होना, कार्यस्थल पर बिना कारण नौकरों या ग्राहकों से साथ तनाव होना, ऋण लेने पर विवश होना, दिया हुआ उधार या धन वापस ना आना, चला चलाया कार्य बंद करने की नौबत आ जाना, इत्यादि |

जब इसका प्रभाव घर पर होता है तब बिना कारण कलह कलेश होना, दीवारों या फर्श पर दरारे पड़ना, परिवार के लोगो का आपस में मनमुटाव होना या बोलचाल बंद होना, पति पत्नी के संबंध अच्छे नहीं होना, घर में मन नहीं लगना, कहीं भागने का मन करना, सम्बन्धियों से अकारण वाद विवाद होना, मित्रों और सम्बन्धियों का शत्रुता करना इत्यादि |

प्रेतात्मा के प्रकार :

प्रेतात्माओं के तीन प्रकार होते है इनमे साधारण प्रेतात्मा, हिंसक प्रेतात्मा और सहायक प्रेतात्मा होती है | ऐसा नहीं है कि एक स्थान पर एक ही प्रकार की प्रेतात्मा होती है, किसी भी स्थान या व्यक्ति पर एक से अधिक प्रकार की प्रेतात्माओं का प्रभाव हो सकता है | जैसे सभी मनुष्यों का स्वभाव भिन्न भिन्न होता है वैसे प्रेतात्माओं का स्वभाव और कर्म भी भिन्न होते है |

साधारण प्रेतात्मा वह होती है जिसका कोई लक्ष्य नहीं होता, जो केवल इधर उधर घूमती रहती है और शरीर मिलने की प्रतीक्षा करती है, ऐसी प्रेतात्माएं सभी जगह होती है जो देखी नहीं जा सकती परन्तु इनके होने का अनुभव होता रहता है, जैसे छाया दिखना, आवाज़ सुनाई देना, ऐसा प्रतीत होना कि आसपास कोई है  इत्यादि | तंत्र विधि की सहायता से ऐसी प्रेतात्मा को वश में करके, इसका प्रयोग किसी की मानसिक, शारीरिक और आर्थिक हानि में किया जाता है | इसका लक्ष्य नहीं होने के कारण जीवित व्यक्ति के विचार और वाक्य इसका लक्ष्य बनते है, आत्मा जब प्रेतात्मा बनती है तब उसे शरीर का बंधन नहीं होता इसलिए वह अपनी ऊर्जा(शक्ति) का प्रयोग अधिक करती है इसी कारण वह जीवित लोगो से अधिक शक्तिशाली होती है | प्रेतात्मा के पास मस्तिष्क नहीं होता इसलिए जीवित लोगो के विचार या शब्द द्वारा आत्माओं को शक्ति और लक्ष्य मिलते है । उदाहरण के लिए जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के लिए सकारात्मक शब्दों का प्रयोग करता है तो वहां आसपास विचर रही सहायक प्रेतात्मा दूसरे व्यक्ति के लिए सकारात्मक कार्य करने लगती है, इसका लक्षण सभी कार्यो का बिना मेहनत के अपनेआप होना है और जब कोई एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के लिए नकारात्मक शब्दों का प्रयोग करता है यानी श्रापित करता है तो वहां विचर रही हिंसक प्रेतात्मा दूसरे व्यक्ति के लिए नकारात्मक कार्य करने लगती है, इसका लक्षण मेहनत करके भी सभी कार्यों में बाधा आना है |

हिंसक प्रेतात्मा वह होती है जो केवल हिंसा करती है इनका लक्ष्य तय होता है कि इन्हें क्या और कैसे करना है | ऐसी प्रेतात्मा को शारीरिक और मानसिक हिंसा करने में बहुत आनंद आता है, दुर्घटना, मारपीट, झगडा, बीमारी, आपरेशन, मृत्यु, बाधा, हानि, अपमान, विवशता, भय और भ्रम का कारण बनना, बच्चों, स्त्रियों और कोमल ह्रदय वाले व्यक्तियों को तंग करना और उनके काम को बिगाड़ना इनके स्वभाव में होता है | ऐसी आत्मा डराती है और स्त्रियों के साथ दुष्कर्म करती है | ऐसी प्रेतात्मा स्वयं के लिए कम दूसरों के लिए अधिक काम करती है, तंत्र विधियों की सहायता से भी ऐसी प्रेतात्मा द्वारा हानि की जाती है |

सहायक प्रेतात्मा ऐसी होती है जो मृत्यु से पहले ईश्वर की भक्ति करती है और किन्हीं कर्मो के कारण इनको दूसरा जन्म नहीं मिलता, यह धार्मिक स्थलों पर भी रहती है | ऐसी प्रेतात्मा को यह ज्ञान होता है कि उसे ईश्वर के नाम या भक्ति से ही उसे मनुष्य जन्म की प्राप्ति हो सकती है इसलिए ये ऐसे स्थान पर रहती है जहां ईश्वर भक्ति, सुमिरन, दया, शुभ कर्म होते है और वहां रहने वाले मनुष्यों, पशुओं और वस्तुओं की अन्य हिंसक प्रेतामाओं द्वारा होने वाली हानि का बचाव करती है | दूसरों की सहायता और सेवा करना इसके स्वभाव में होता है, यह जिस स्थान पर रहती है उसे अपना घर समझती है और उस परिवार या परिवार के किसी सदस्य को अपना समझती है और समस्या या अनहोनी के बारे में अप्रत्यक्ष रूप से सूचना देती है, जैसे कुछ लोगों को अचानक किसी बात का आभास हो जाता है |

प्रेतात्माएं अधिकतर घर और परिवार में रहती है, इन्हें लोगों और वस्तुओं से बहुत अधिक मोह होता है, कभी कभी जो लोग अपने परिवार से रुष्ट या असंतुष्ट होती है वह प्रेतात्मा बनने पर अपने परिवार वालों के लिए बड़ी बड़ी समस्याओं का कारण बनती है, यह शारीरिक, मानसिक और आर्थिक हानि अपनी ही तीन पीढ़ियों तक करती है | तीन पीढ़ियों तक इनकी आयु सौ वर्ष की हो जाती है तब प्रेतात्मा भूत बन जाती है और इनमे अतिरिक्त शक्ति आने के कारण यह अन्य लोगों के दुख का कारण भी बनती है | भूत या प्रेत के लिए पीड़ित व्यक्ति द्वारा उपचार / उपाय इत्यादि करने से इसे मुक्ति मिलती है |

जिस स्थान पर भूत होते है वहां के भवन खंडर में बदल जाते है, उन खंडरों में विषधारी जीव जैसे सर्प, बिच्छु इत्यादि जीवों का वास हो जाता है और वंश में कोई भी व्यक्ति (स्त्री या पुरुष) जीवित नहीं बचता | भूत पूरे वंश की मृत्यु का कारण बनता है और मृत्यु के बाद आत्मा बनी प्रेतामाओं को अपना दास बना कर रखता है और उनके ना चाहने पर भी उनसे क्षति करवाता है | भूत में प्रेत से दस गुना अधिक शक्ति होती है इसलिए प्रेतात्माएं भूतों से डरती है और उनका कहा मानती है |

जिन्न मैदानों में रहता है जहां दूर दूर तक कोई वनस्पति, ईमारत, पशु पक्षी या मनुष्य नहीं होते, इसकी नकारात्मकता का प्रभाव इतना अधिक होता है कि यह जिस स्थान से गुज़रते है वहां मैदान हो जाता है इनके मार्ग में आने वाली सभी इमारतें आबादी समेत नष्ट हो जाती है | भूत और प्रेत दोनों जिन्न से भयभीत रहते है और इसका कहा मानते हैं |

प्रेत अकेला होता है, एक भूत के साथ कई प्रेत होते है और एक जिन्न के साथ कई भूत और असंख्य प्रेत होते है | जिस व्यक्ति या स्थान पर एक या एक से अधिक प्रेत हो, उनके लिए उपाय, विधि इत्यादि करके उन्हें एक एक करके भगाया जा सकता है परन्तु जिस स्थान पर भूत हो उस व्यक्ति या स्थान से उसका प्रभाव समाप्त करना कठिन कार्य होता है और किसी व्यक्ति या स्थान को जिन्न की पकड़ से छुड़ाना लगभग असंभव होता है परन्तु संभव है | इसी कारण भूत, प्रेत और जिन्न से सभी को भय होता है |

प्रेतात्मा से भय के कारण अधिकतर लोग इस बात को मानने से इनकार करते है कि उन्हें इस प्रकार की कोई समस्या है हालांकि लगभग सभी लोगो के पास सुना सुनाया कुछ ज्ञान अवश्य होता है, आसपास के लक्षण के अनुसार उन्हें यह भी पक्का होता है कि उन पर या उनके घर / आफिस पर प्रेतात्मा की समस्या है परन्तु यह बात कहने और सबके सामने स्वीकार करने में शर्म महसूस करते है | प्रेतात्मा की समस्या को छूआछूत से भी भयानक समस्या समझा जाता है और ऐसा सोचा जाता है कि इसका कोई उपचार नहीं है जबकि ऐसा नहीं है संसार में समस्या है तो उसका समाधान भी है | प्रेतात्मा पर विश्वास नहीं करने से इसका प्रभाव समाप्त नहीं होगा बल्कि इसका उपचार करने से ही इससे छुटकारा पाया जा सकता है |

प्रेतात्मा जहां भी होती है सबसे पहले वहां भ्रम की स्थिति बनाती है, प्रभावित व्यक्ति या परिवार यह निर्धारित नहीं कर पाते कि उन्हें प्रेतात्मा की समस्या है या कोई और दूसरी समस्या है | भ्रमित करने के बाद भयभीत करना और धन का अनावश्यक खर्च करवाना प्रेतात्मा की प्रिय क्रीडा है इसलिए अधिकतर लोग डॉक्टर के इलाज में धन खर्च करते रहते है जिसमे उन्हें कोई लाभ नहीं मिलता | प्रेतात्मा के इसी स्वभाव के कारण कुछ लोग इसका प्रयोग दूसरों की हानि के लिए करते है |

प्रेत को अशुद्ध और नकारात्मक स्थान और लोग अति प्रिय होते है, इसी कारण प्राय: प्रेत अशुद्ध और नकारात्मक विचारों वाले लोगो को अपना निशाना बनाते है | प्रेतात्मा का जीवित लोगों को पकड़ करने एक कारण यह है कि प्रेतात्मा सांसारिक भोग चाहती है जो केवल शरीर द्वारा ही हो सकते है | प्रेत से पकड़ किए व्यक्ति द्वारा खाने पीने की वस्तुओं की सुगंध लेना और सम्भोग का आनंद लेना प्रेत के स्वभाव का एक हिस्सा है, अनेकों स्त्रियों को यह अनुभव भी होता है कि उनके साथ कोई व्यक्ति यौन क्रिया कर रहा है | प्रेत में जीवित लोगों से सौ गुना अधिक शक्ति होने के कारण वह उस शक्ति का प्रयोग जीवित लोगो के साथ क्रीडा करने में करती है | प्रेतात्मा अपनी पकड़ करते ही व्यक्ति के विचारों पर हावी हो जाती है जिसके कारण व्यक्ति गलत फैसलों और गलत आदतों का शिकार हो जाता है | प्रेत की पकड़ पुरानी होने के साथ साथ व्यक्ति का अपने मस्तिष्क और शरीर पर संतुलन कम होता जाता है जिसके कारण व्यक्ति के व्यवहार में अकस्मात् बदलाव देखे जाते है | व्यक्ति का अपने परिवार के लोगो से घृणा होकर मृत्यु के बारे में सोचना या मृत्यु होने की इच्छा होना, प्रेतात्मा की पकड़ (प्रभाव) होने का ही एक लक्षण है |

प्रेतात्मा की पकड़ का दूसरा कारण परिवार से होता है, घर, माता पिता या अन्य सम्बन्धी को प्रेत की पकड़ होने पर व्यक्ति भी उस पकड़ में आ सकता है | माता को पकड़ होने पर जन्म लेने वाले शिशु पर इसका शतप्रतिशत प्रभाव होता है | रजस्वला होने पर पकड़ वाली स्त्री के साथ सोने पर भी किसी अन्य स्त्री या बालिका पर इसकी पकड़ होने की सम्भावना बहुत अधिक होती है | यदि प्रेतात्मा की पकड़ घर पर है तो घर में रहने वाले सभी सदस्यों पर इसकी पकड़ होती है परन्तु सभी सदस्यों पर इसका प्रभाव एक जैसा नहीं होता, पकड़ होने वाले व्यक्ति के अपने कर्मों के आधार पर इसका प्रभाव होता है |

लक्ष्यहीन प्रेतात्मा को विशेष तंत्रविधि द्वारा अपने अधीन करके उनसे अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करवाया जाता है | किसी की हानि के लिए ही इनका प्रयोग किया जाता है परन्तु कुछेक कार्यों में इसका सकारात्मक प्रयोग भी होता है परन्तु ऐसा बहुत ही कम किया जाता है | प्रेत के नकारात्मक प्रयोग से किसी के कार्य में विघ्न-बाधा करना या शारीरिक, मानसिक और आर्थिक हानि की जाती है जबकि इसके सकारात्मक प्रयोग से बाधाओं को समाप्त किया जाता है | कई बार प्रेत किसी स्त्री या पुरुष से प्रसन्न होकर या मोहित होकर भी उसके लिए सकारात्मक कार्य करती है ऐसा अधिकतर प्रेतात्मा की अपनी इच्छा से ही होता है |

किसी व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति के लिए ईर्ष्या, श्राप, प्रार्थना, प्रेम और आशीर्वाद वाले शब्द अथवा विचार इन प्रेतों के लिए लक्ष्य बनते है | व्यक्ति द्वारा कही या सोची गयी बात को अपना लक्ष्य मानकर प्रेत उस कार्य में लग जाते है इसी कारण लाभ और हानि वाले वह कार्य हो जाते है जो कभी सोचे नहीं होते, इनमे सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार के कार्य और परिणाम होते है | किसी समस्या का कारण समझ ना आने पर इसे नज़र लगना, टोक लगना या बाधा होना भी कहा जाता है | किसी के बारे में अच्छा या बुरा कुछ भी सोच कर यदि उसे सफ़ेद और मीठी वस्तु खिलाई जाए तो उस कार्य को प्रेत अति शीघ्रता से करते है क्योंकि यह सफ़ेद और मीठे द्वारा शरीर में प्रवेश करते है इसीलिए प्रेत का प्रभाव करने के लिए मीठे और सफ़ेद वस्तु का प्रयोग किया जाता है | विचार(मन), सफ़ेद और मीठे का कारक चंद्रमा है मन नकारात्मक है जिसके कारण नकारात्मक विचारो के साथ खिलाया गया मीठा या सफ़ेद अधिक प्रभावशाली होता है |

प्रेत की पकड़ को अधिक हानिकारक बनाने के लिए विशेष क्रिया की सहायता से चिता की राख, खून, बाल, त्वचा, हड्डी या कपडा इत्यादि प्रयोग में लिया जाता है  परन्तु किया गया जादू टोना निष्फल ना हो उसके लिए मसान(चिता की राख का अंश) किसी वस्तु में मिला कर खिलाया जाता है | खाए हुए मसान का प्रभाव समाप्त करना बहुत ही कठिन कार्य है क्योंकि उसका असर व्यक्ति की हड्डियों और नसों तक हो जाता है जबकि उपरी जादू, टोटका विशेष उपायों द्वारा समाप्त किया जा सकता है | शरीर में रम चुके प्रेत के कुछ अतिरिक्त लक्षण भी होते है जैसे पीड़ित के शरीर में कम्पन होना, पीड़ित व्यक्ति का बहुत अधिक खाना या बिलकुल ना खाना, सर्दी में बहुत गर्मी लगना और गर्मी में बहुत सर्दी लगना, प्रेत का पीड़ित में बोलना, प्रेत द्वारा मनुष्य जन्म वाली सारी आदते पीड़ित व्यक्ति के शरीर में रह कर करना | पीड़ित व्यक्ति के पिछले जन्मों के कर्म या अभी के शुभ कर्म ऐसे हो कि प्रेत द्वारा अधिक हानि नहीं हो सकती हो तो फिर प्रेत अकारण बीमारी के लक्षण बना कर धन हानि करता है, डॉक्टर के पास जाने तक पीड़ित व्यक्ति को बीमारी होती है परन्तु किसी मेडिकल टेस्ट में किसी बीमारी का कोई लक्षण नहीं आता |

भूत अत्यधिक शक्ति वाला होता है इसलिए तंत्र करने वाले व्यक्ति भूत द्वारा कठिन कार्य करवाते है जिसमे किए जाने वाले कार्य की एक निश्चित अवधि तय की जाती है, भूत को कहा जाता है कि इतनी अवधि में किसी व्यक्ति विशेष की कितना, कैसे और क्या हानि करनी है | लक्ष्य निर्धारित होने पर भूत अपने कार्य को अवधि के अनुसार पूरा करता है | इसमे ऐसे प्रकार का तंत्र भी होता है जिसमे प्रेत चौबीस घंटे में बताया गया कार्य करता है और बिना कार्य किए वापिस नहीं आता, ऐसे तंत्र में सामने वाले की मृत्यु भी निश्चित की जा सकती है | इस तरह के तंत्र में, तंत्र करवाने वाले परिवार से किसी जवान व्यक्ति को दांव पर लगाया जाता है यदि किसी कारण वश भूत अपना कार्य करने में असफल हो जाए (ऐसा लाखो में एक बार ही होता है) तो दांव पर लगे व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है | तंत्र प्रभावित परिवार या व्यक्ति के बलवान कर्म या गुरु द्वारा की गई सुरक्षा/ बचाव  के कारण ऐसे प्रेत बिना कार्य को पूरा किए वापिस लौटना पड़ता है |

जन्म और मृत्यु वाले घर परिवार पर प्रेत का बहुत अधिक नकारात्मक प्रभाव होता है इसीलिए ऐसे घर परिवार को अशुद्ध और अपवित्र कहा जाता है | किसी आत्मा का शरीर धारण करना या शरीर को त्यागना प्रेत को आकर्षित करती है, जन्म लिए शिशु का शरीर अति कोमल और निर्बल होता है प्रेतों का नए शरीर में प्रवेश करने का अवसर होता है इसलिए प्रेतात्माएं ऐसा करने के लिए प्रयास भी करती है | मृत्यु होने पर आत्मा शरीर छोड़ कर प्रेतात्मा बनती है इसलिए नए प्रेत से मिलने और उसके साथ सम्बन्ध बनाने की इच्छा से असंख्य प्रेत वहां आ जाते है | ऐसे घर में अधिक प्रेतों की उपस्थिति से वहां पर उपस्थित भावुक लोगो को पकड़ होने की सम्भावना भी अधिक होती है इसलिए कोमल ह्रदय वाले भावुक लोगो को वहां जाने से मना किया जाता है |

एक बार किसी व्यक्ति या घर पर प्रेत की पकड़ होने पर इसकी दोबारा पकड़ होने सम्भावना बनी रहती है | प्रेत की पकड़ से छुडाए व्यक्ति या स्थान की आभा ऐसी हो जाती है कि यह दूसरी प्रेतात्माओं को अपनी ओर आकर्षित करती है या किसी के द्वारा किए गए जादू टोने या श्राप देने का प्रभाव अति शीघ्र होता है | किसी व्यक्ति या स्थान की भूत प्रेत से रक्षा के लिए समाधान का ज्ञान होना चाहिए या किसी ऐसे व्यक्ति का आश्रय होना अति आवश्यक है जो समस्या के आधार पर तार्किक और सटीक मार्गदर्शन करे |

प्रेत बहुत ही चालाक और तेज़ गति वाले होते है इन्हें आसपास की होने वाली हर गतिविधि और घटना का ज्ञान पहले से ही हो जाता है | प्रेत को पीड़ित व्यक्ति द्वारा उपाय / उपचार करने या बार-बार बदलने का ज्ञान हो जाता है जिससे इनकी शक्ति को और अधिक बल मिलता है | पीड़ित व्यक्ति के मन का विश्वास एक स्थान/व्यक्ति पर ना टिकना प्रेत को और अधिक बल देने का कार्य करता है, बिना श्रद्धा और विश्वास का मन प्रेत की भांति ही इधर उधर भटकता रहता है |

जादू टोना :

प्राय: जादू टोना परिवार, सम्बन्धी या मित्रता में ही होता है, जादू टोना करने या करवाने के मुख्य कारण :धन, मानसम्मान, सुन्दरता, पति पत्नी का प्रेम, बच्चो का आज्ञाकारी या पढाई में लायक होना, कारोबार बहुत अच्छा होना इत्यादि है | भाई-भाई, भाई-बहन, पति पत्नी, सास-बहु, देवरानी-जेठानी, मित्र-पडोसी, प्रेमी-प्रेमिका, मातापिता-बच्चे, एवं अन्य सम्बन्धी भी एक दूसरे से अपना कहना मनवाने या अपने वश में करने के लिए करते है | ईर्ष्या और अहंकार के कारण किए गए जादू टोने का प्रभाव कभी कभी स्वयं के लिए भी हानिकारक हो जाता है | अपनी बात मनवाने के लिए, दूसरों को नीचा दिखाने, दूसरों की धन या सम्बन्ध हानि, दुर्घटना करवाने, यहाँ तक की मृत्यु करवाने के लिए भी जादू टोने का प्रयोग किया जाता है |

जादू करने में उल्लू का प्रयोग किया जाता है जब किसी व्यक्ति की ईर्ष्या अपनी चरम सीमा पर होती है तो वह दूसरे व्यक्ति पर ऐसा तंत्र करवाता है जिसमे उल्लू के रक्त और अंगों का प्रयोग होता है ऐसा वार खाली नहीं जाता व्यक्ति स्वयं ही गलतियां करके इतनी धन हानि कर लेता है कि खाने को भी मोहताज हो जाता है और उसके परिवार के लोग, मित्र, सम्बन्धी इत्यादि उसका साथ नहीं देते |

सकारात्मक प्रेतात्मा :

जिन लोगों के विचार धार्मिक या अध्यात्मिक होते है ऐसे लोगो की प्रेतात्मा को मुक्ति के मार्ग का ज्ञान होता है परन्तु जब तक नया शरीर नहीं मिलता तब तक उन्हें अच्छे कर्म बनाने के लिए दूसरी आत्माओं पर निर्भर रहना पड़ता है । यह जीवित व्यक्ति के मुश्किल के समय उसकी सहायता करके अपनी मुक्ति का मार्ग स्वयं बनाती है, ऐसी प्रेतात्मा धार्मिक स्थानों पर रहते हुए वहां आने जाने वाले लोगों की अप्रकट रूप से सहायता भी करती है जिसके फल से प्रेतात्मा को नया शरीर मिलता है । जिन प्रेतात्माओं के अच्छे कर्म इतने हो जाते है कि उन्हें इच्छा करने पर अगला जन्म(शरीर) मिल सकता है परन्तु फिर भी वे धार्मिक स्थल पर रह कर लोगों का कार्य करना चाहती है और जन्म नहीं लेना चाहती, ऐसी प्रेतात्माओं में सकारात्मक शक्ति आ जाती है जिसका सदुपयोग यह अच्छे कर्मों वाले लोगो में प्रवेश करके अन्य लोगो की भलाई करने करती है  | ऐसा अनेकों बार देखा जाता है कि एक समय में कई कई व्यक्तियों में एक साथ दैवीय शक्तियां आती है, अज्ञानता के कारण हम उन्हें देवी देवता मान लेते है जबकि वह अच्छी प्रेतात्माएं होती है ना की देवी देवता होते है | देवी देवताओं की आत्माएं अपने एक निर्धारित स्थान पर विराजमान रहती है जो साधारण प्रेतात्माओं की भांति इधर उधर नहीं भटकती है | सौ वर्ष का होने पर अच्छी प्रेतात्माएं भूत नहीं बनती बल्कि उनमे ऐसी शक्ति आ जाती है कि वह मानव कल्याण के लिए किसी अच्छे कर्मों वाले व्यक्ति का शरीर प्रयोग कर सकती है | एक हज़ार वर्ष का होने पर अच्छी प्रेतात्माएं जिन्न नहीं बनती बल्कि इनको सीधे किसी अवतार का जन्म मिलता है |

 प्रेतात्माएं परिवार या आसपास के लोगो से मिलने आती है और परेशान भी करती है | पुरुषो की तुलना में स्त्रियों और बच्चो की आत्मा निर्मल और भावुक होने के कारण प्रेतात्माएं उन्हें मानसिक और शारीरिक क्षति करती है | बहुत सालो के बाद भी जब प्रेतात्माओं की गति नहीं होती (अगला जन्म नहीं मिलता) तो ये क्षति करने लगती है जिससे व्यक्ति या परिवार के लोग उनके लिए प्रार्थना या शुभ कर्म इत्यादि करे और उनको नया शरीर मिले |

मनुष्यों की भांति आत्माएं भी भिन्न भिन्न स्वभाव की होती है कई बहुत क्रूर और कई बहुत नर्म स्वभाव की होती है | किसी जातक पर इनका प्रभाव है उसके कुछ लक्षण होते है जैसे कोई व्यक्ति को नाम ले कर पुकार रहा है जबकि आसपास कोई भी नहीं होता | जातक को लगता है कि आसपास सफ़ेद या काले वस्त्र वाला कोई है या चल रहा है जब देखा जाता है तो कोई नहीं होता | जातक को लगता है कि उसके शरीर के अंगों से छेड़छाड़ जैसे उसके साथ कोई यौन क्रियाएं या सहवास कर रहा है | जातक को मृत लोगो का दिखना और उनके द्वारा पुकारा जाना उनका सपनो में आना और उससे खाने पीने की वस्तुवे माँगना भी एक ऐसा ही लक्षण है | किसी जातक को कोई प्रेतात्मा क्यों तंग करती है या उसका साथ देती है इसके पीछे भिन्न भिन्न कारण होते हैजातक बीमार है परन्तु किसी भी मेडिकल टेस्ट में कोई समस्या नहीं आती है तो यह प्रेतात्मा का प्रभाव होता है |

यदि इन प्रेतात्माओं को किसी के साथ मोह हो जाये तब या तो वह उसे हानि करती है या फिर बहुत मदद भी करती है | किसी व्यक्ति के व्यवहार, आँखें, बोलने का ढंग और हाव भाव से भी यह पता लगाया जा सकता है कि उस व्यक्ति पर किसी प्रेत का प्रभाव है | जो लोग प्रेतात्माओं से कार्य करवाना जानते है वह इनका उपयोग किसी का भला करने और नुक्सान करने में करते है | आज के व्यस्त जीवन में लोगो के पास अपने लिए समय नहीं है इसलिए लोग किसी भी प्रेतात्मा की गति करवाने या मोक्ष के लिए मेहनत और धन या समय खर्च नहीं करते | यदि किसी व्यक्ति या स्थान पर किसी प्रेतात्मा का प्रभाव हो तो डरने की कोई बात नहीं है क्योंकि Napoo पद्धति द्वारा सभी प्रकार की प्रेतात्माओं की गति संभव है | सबसे पहले यह पता लगाना आवश्यक होता है कि प्रेतात्मा स्वयं आई है या फिर उसे किसी ने किसी महत्वपूर्ण कार्य को करने के लिए भेजा गया है |

कभी कभी प्रेतात्माएं पीड़ित व्यक्ति के शरीर में बोलने लगती है ऐसी प्रेतात्माओं की गति (मोक्ष) करवाना बहुत ही कठिन होता है क्योंकि ये आत्माएं अपनी गति नहीं चाहती | प्रेतात्माओं को समझने और उनकी गति में सहायता करने के लिए ऐसे व्यक्ति का होना अति आवश्यक है जिसकी कर्मपूँजी अधिक हो और वह ऐसा कार्य करना भी जानता हो | ऐसे व्यक्ति के संपर्क में रहने से भी प्रेतात्माएं क्षति नहीं करती परन्तु इनके उपचार के लिए बार बार व्यक्ति या विधि बदलने से यह और अधिक क्षति करती है  | प्रेतात्मा से पीड़ित या प्रभावित व्यक्ति को बालक के जन्म और मृत्यु वाले घर नहीं जाना चाहिए और धुम्रपान, मॉस मदिरा और बुरे कर्मो को त्याग देना चाहिए | प्रेतात्माएं मानसिक, शारीरिक और आर्थिक हानि करती है और किसी व्यक्ति को मिलने वाले कर्मो के फल को रोक सकती है | किसी व्यक्ति को उसके किए कर्मो के फल को मिलने में रुकावट डालना प्रेतात्माओं का अति प्रिय कार्य है |

महत्वपूर्ण  लक्षण :                           

1.धार्मिक बातों और धार्मिक लोगो से घृणा होना और उन पर क्रोध आना 

2.घर में धन और सौभाग्य का अभाव होना, धन आने से पहले ही व्यय आ जाना 

3.पति पत्नी के आपस में संबंध अच्छे ना रहना, एक दुसरे से घृणा हो जाना 

4.कुछ भी अच्छा ना लगना, हमेशा उदासी, शरीर भारी और थकान रहना 

5.हर कार्य में रुकावटें आना, बनते बनते काम रुक जाना 

6.सदा भय, भ्रम और असुरक्षा का अनुभव होना, कोई भी निर्णय ना ले पाना 

7.घर और चेहरे की चमक समाप्त हो जाना, घर में शांति ना होना 

8.बीमार रहना परन्तु बीमारी का पता ना चलना, कोई भी औषधि काम ना करना 

9.मित्रों और सम्बन्धियों का ईर्ष्या और शत्रुता करना, अच्छा करने पर भी बुराई मिलना 

10.घर में बिना वजह का वाद विवाद (बहस) और झगडा होना, आपस में बोलचाल बंद हो जाना 

  1. मन सदा अशांतरहना और अप्राकृतिक कार्यो को करने की इच्छा होना

इसके अतिरिक्त नकारात्मक शक्ति के अनेको प्रभाव होते है जो व्यक्ति के जीवन मे समस्या का कारण बनते है |

बुरी नज़र, टोटकों या प्रेतात्मा से पीड़ित अधिकतर लोग ग्रहों से सम्बंधित उपाय करना शुरू कर देते है, नकारात्मक शक्तियों की पूरी जानकारी नहीं होने के कारण भी ऐसा समझा और बताया जाता है कि ग्रहों के उपायों को करने से बुरी नज़र, टोटकों, प्रेतात्मा इत्यादि की समाप्त हो जाएगी परन्तु समस्या ठीक नहीं होती क्योंकि गलत उपायों के नकारात्मक फल से प्रेतात्मा को नकारात्मक बल मिलता है जिससे हर उपाय को करने के बाद समस्या गंभीर होती रहती है और प्रेतात्मा बलशाली होती रहती है |

किसी भी नकारात्मक शक्ति का उपचार करने से पहले यह समझ होनी चाहिए कि आकाश में स्थित ग्रह और नकारात्मक शक्तियाँ दोनों का कार्य और प्रभाव अलग अलग है | ग्रह आकाश में है जो एक गति व दिशा में चलते है और उनकी सूक्ष्म किरणें पृथ्वी पर पड़ती है जबकि नकारात्मक शक्तियाँ पृथ्वी पर है जिनकी गति व दिशा ग्रहों जैसी बिलकुल भी नहीं है इसलिए ग्रहों के उपाय करने से प्रेतात्मा का प्रभाव कभी भी समाप्त नहीं होता |

सभी जानते है कि जीव पृथ्वी पर कर्म करता और यहीं अपने सभी प्रकार के कर्मफलों को भोगता भी है इसका सीधा अर्थ यह है कि जीव पर पृथ्वी का प्रभाव सबसे अधिक है प्राय: यह भी कहा जाता है कि आत्मा मनुष्य जन्म सहित चौरासी लाख प्रकार के जन्म लेती है और इन सभी योनियों का वर्णन पृथ्वी पर ही है ऐसा एक भी प्रमाण नहीं है जिससे यह निश्चित हो कि आत्मा किसी अन्य ग्रह पर जाकर जन्म लेती है यह भी सभी जानते है कि मृत्यु के बाद आत्मा पृथ्वी पर ही प्रेतात्मा बनती है और बुरी नज़रटोने-टोटके और प्रेतबाधा पृथ्वी पर रहने वाले जीवों को ही होती है |

इसका सीधा अर्थ यह है कि बुरी नज़र, टोने-टोटकोंनकारात्मकता और प्रेत बाधा का सम्बन्ध केवल पृथ्वी से है यह स्पष्ट है कि प्रेत किसी अन्य ग्रह से नहीं आते है इसलिए प्रेत बाधा के लिए पृथ्वी के अतिरिक्त ग्रहों की गणना करना उचित नहीं है पृथ्वी पर ही प्रेत बाधा के लिए क्रियाएं होती है उसके लिए किसी अन्य ग्रह पर नहीं जाना पड़ता है | प्रेतबाधा और ग्रहचालदोनों भिन्न भिन्न विषय है लोग जन्मकुंडली द्वारा ग्रहों की गणना करते समय सूर्यचन्द्रमंगलबुधबृहस्पतिशुक्रशनिराहू और केतू की गणना तो करते है परन्तु पृथ्वी की गणना कभी नहीं करते है | पृथ्वी का सम्बन्ध सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों और ऊर्जाओं से है इसलिए जीव पर पृथ्वी के प्रभाव को अनदेखा करना, गंभीर गणना-दोष कहा जा सकता है सभी ग्रहों के साथ पृथ्वी की गणना नहीं करने का अर्थ है कि आप जिस घर में रहते हो उसके बारे में ना सोच कर पड़ोसियों के घर का हिसाब लगाकर दुखी होते रहते हो पृथ्वी से दूर के सभी ग्रहों  की गणना कर ली लेकिन जिस पर रहते हो उसका सोचा तक नहीं यदि पृथ्वी की गणना करनी आ जाये तो सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों की गणना करनी आ जाती है | 

यदि ग्रहों के उपायों को करने के बाद भी समस्या जस की तस बनी रहे तो यह इस बात का प्रमाण है कि समस्या का संबंध ग्रहों से नहीं बल्कि नकारात्मक शक्तियों से है | नकारात्मक शक्तियों का उपचार करने के लिए प्रेतात्मा, बुरी नज़र, टोटकों इत्यादि के बारे में सम्पूर्ण ज्ञान होना अति आवश्यक है क्योंकि इसमें आधी-अधूरी जानकारी हानि करती है | नकारात्मक शक्तियों के प्रकार का पता लगाकर और उसके नकारात्मक प्रभाव के आधार पर ही सटीक उपचार करना चाहिए | एक समझने वाली विशेष बात यह है कि बार- बार उपायों को बदलने से और आधारहीन या तर्कहीन उपायों को करने से नकारात्मक शक्तियों को बल मिलता है जिससे समस्या अधिक गंभीर हो जाती है |

प्रेतात्मा और सभी नकारात्मक शक्तियों के उपचार में कुछ महत्वपूर्ण बातें है जिनको समझना अति आवश्यक है | इसके उपचार से पहले यह निश्चित होना चाहिए कि किस प्रकार के तात्विक उपचार की आवश्यकता है क्योंकि सभी कुछ एक साथ प्रयोग करने से समस्या समाप्त होने के बजाय अधिक गंभीर होने की संभावना है इसलिए नकारात्मक प्रभाव के आधार पर ही उपचार होना चाहिए |

अनजाने में होने वाले गलत उपायों से भी नकारात्मक शक्ति बलवान होती है इसलिए कभी भी सुने सुनाये उपायों को ना करें | वैसे तो स्वप्न, लक्षण, व्यवहार और पीड़ित व्यक्ति, घर, संबंध और आसपास के माहौल से यह भी पता लगाया जा सकता है कि पीड़ित पर किसी श्राप, टोना-टोटका, बुरी नज़र इत्यादि का प्रभाव है या प्रेतात्मा का प्रभाव है |

बुरी नज़र से सम्बंधित सपने : ऊचाई से गिरना, किसी के द्वारा धक्का देना, जल में घिरा देखना, मृत्यु देखना, परीक्षा में फेल होना, स्वयं को आयु से छोटा देखना, काला रंग देखना, डर लगना, घबराहट होना, प्यास लगना, धन या स्वर्ण खो जाना, रास्ता भटक जाना, किसी की भारी वस्तु उठाना इत्यादि

टोने टोटकों से सम्बंधित सपने : ह्त्या करने के लिए कोई पीछा करना, पानी में डूबना, भूकंप आना, रिश्तेदारों से गली गलोच होना, ऊटपटांग सपने देखकर सुबह शरीर भारी रहना, सांप काटना, शराब पीना, मांस खाना, अनैतिक सम्बन्ध की इच्छा होना, अप्राकृतिक क्रियाएं करना, स्वयं को नग्न देखना, पुत्र-पुत्री की मृत्यु होना इत्यादि

भूत प्रेत से सम्बंधित सपने : मृतको का दिखना, शौचालय बार बार दिखना, मल-मूत्र दिखना, मृतक के साथ सहवास करते दिखना, जानवर के साथ शारीरिक सम्बन्ध होना, किसी प्रेत के साथ क्रियाएं करना, काली परछाई दिखना, डरावने चेहरे दिखना, शरीर हिलना, मृतक के साथ जाना, प्रेत के साथ खाना, प्रेत नाचते हुए दिखना इत्यादि  |

Napoo foundation की एक बात विचारणीय है कि हर युग में समस्या और आवश्यकता बदलती रहती है जिसके अनुसार विधियों और उपायों में बदलाव होता रहता है इसलिए पुराने समय की समस्या के लिए हो चुका उपाय, आज की समस्या के लिए पूर्णत: कारगर नहीं है | नकारात्मक शक्ति का सही उपचार करने के लिए अधिक उपाय करने से बड़ी गलती होने के संभावना भी अधिक है इसलिए उपायों की अधिकता की नहीं बल्कि सटीकता की आवश्यकता है |

सावधानी : प्रेतात्मा, टोना टोटका, मत्र्घात इत्यादि नकारात्मक शक्तियों का उपचार करने के लिए सुने सुनाये प्रयोग ना करें अन्यथा परिणाम हानिकारक हो सकता है |

भाग २ 

क्या आप जानते है कि किसी को उपाय बताने से भी नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव होता है !

ऐसे कई सज्जन है जो भिन्न प्रकार के विज्ञानों की सहायता से लोगो की समस्याओं के लिए उपाय बताते है जो उनके स्वयं के लिए हानिकारक होता है | Napoo फाउंडेशन के पिछले कई सालों के अनुभव और शोध से यह निष्कर्ष निकला है कि मार्गदर्शक का कार्य करने वाले लोगों को, दूसरों की समस्याओं के लिए उपाय बताने के बदले गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है | इनमे मुख्य समस्या उनका स्वास्थ्य या पारिवारिक तथा धन के सुख की कमी है | इसका मुख्य कारण यह है कि मार्गदर्शक उपाय बताकर बाधा समाप्त करने का यत्न करता है और यह समझता है कि ऐसा करना मेरा व्यवसाय है और जातक की समस्या दूर होने पर भी मुझे अतिरिक्त लाभ पुण्यकर्म के रूप में भी मिलेगा परन्तु ऐसा नहीं है | यदि ऐसा होता तो उपाय बताने या किसी बाधा पर कार्य करने वालों को तो कभी कोई समस्या ही नहीं होती क्योंकि उनके पुण्यकर्म तो दिन प्रतिदिन बढ़ रहे है | हम सभी जानते है कि संसार कर्मों के लेनदेन से चलता है जब तक लेनदेन समाप्त नहीं होता तब तक आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती | मार्गदर्शक जिस भी ग्रह या देव का उपाय बताता है वह ग्रह या देव उस ग्रसित व्यक्ति को तभी छोड़ेंगे जब उनका हिसाब व्यक्ति और समस्या में मध्यस्था करने वाला मार्गदर्शक स्वयं दे |

ऐसा भी माना जाता है कि ग्रह या देव पूजा अर्चना से प्रसन्न होते है साथ ही यह भी कहा जाता है कि स्वार्थ में की गयी पूजा अर्चना का कोई लाभ नहीं होता, ऐसी पूजा अर्चना करने से तो नहीं करना अच्छा है | ग्रह या देव मार्गदर्शक के संबंधी नहीं हैं ना ही उसके सेवक है कि उसके बताये उपाय को करने से व्यक्ति की बाधा/समस्या समाप्त करेंगे और व्यक्ति के कर्मफल भी समाप्त हो जायेंगे | कर्मफल को समाप्त करने के लिए समस्या ग्रसित व्यक्ति के साथ साथ मार्गदर्शक अपनी कर्मपूंजी रुपी ऊर्जा को कर्मफल समाप्त करने में लगाये तो ही वह उपायों के नकारात्मक प्रभाव से बच सकता है, परन्तु अधिकतर मार्गदर्शक ऐसा करना जानते ही नहीं | यहाँ तक कि उपाय बताने वाले लोगों की एक बड़ी संख्या को तो इस बात का ज्ञान ही नहीं है कि उन पर उपाय बताने से कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ता है जबकि किसी का कार्य पूरा होने पर पुण्यकर्म ही समझते है | यदि किसी का सही मार्गदर्शन करने से सकारात्मक प्रभाव है तो व्यक्ति को उसके कर्मफल मिलने में बाधा बनने पर नकारात्मक प्रभाव भी है जो मार्गदर्शक को ही मिलता है |

यदि हम आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो हर कर्म का एक फल होता है और वह फल तब तक समाप्त नहीं होता जब तक उसको पूरा भोगा नहीं जायेगा | जब कोई व्यक्ति मार्गदर्शक द्वारा बताई गयी विधि, उपाय, दान, पूजा इत्यादि को श्रद्धा से करता है तो उसकी बाधा/समस्या का प्रभाव मार्गदर्शक पर पड़ता है, क्योंकि मार्गदर्शक ने उस व्यक्ति और बाधा(समस्या) की मध्यस्था की है इसलिए उसे भी बाधा/समस्या का एक भाग अवश्य भोगना पडता है | क्योंकि यह विषय नकारात्मक शक्तियों से सम्बंधित है इसलिए व्यक्ति का बिना भोगा कर्मफल मार्गदर्शक के हिस्से में आता है जिसके प्रभाव से मार्गदर्शक के जीवन में ऐसी समस्याएं भी आती है जो उसके भाग्य की नहीं होती | यदि मार्गदर्शक कोई उपाय बताता है तो इस जन्म या अगले किसी जन्म में दूसरों के भाग्य के कर्मफल, जो उसके साथ साथ चलते है उसे भोगने पड़ते है | ऐसे अनेकों व्यक्तियों से आप भी मिलते होंगे जिनका यह कहना होता है कि उन्होंने अपने जीवन काल में किसी का मन नहीं दुखाया और ना ही ऐसा कोई कर्म किया है जिसका उन्हें ऐसा दंड मिले, इसका मुख्य कारण उनके द्वारा किसी को कोई उपाय बताना होता है  | जीवन में अकारण नकारात्मकता से बचने के लिए किसी को भी कोई उपाय ना बताएं यह आपके हित में है |

एक विशेष ध्यान रखने वाली बात यह है कि किसी व्यक्ति की सहायता करने के लक्ष्य से बताये गए उपायों का भी नकारात्मक प्रभाव होता है | उद्धाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति ने कोई घर पर कब्ज़ा किया हुआ है और आप उसे एकदम अभी वो कब्ज़ा छोड़ने को कहेंगे तो वह व्यक्ति आपसे झगडा करेगा और घर के मालिक से भी पहले आपकी हानि करेगा | इसी प्रकार नकारात्मकता को समाप्त करने का तर्क और ज्ञान नहीं हो तो उपाय बताना या उपाय करना अति हानिकारक होता है |

अपनी समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए लोग तरह तरह के प्रयोग करते है परन्तु उन्हें आराम नहीं मिलता क्योंकि वे उपायों के स्थान पर प्रयोगों को करने में समय, धन और ऊर्जा को नष्ट करते है | इस बात को एक बार अवश्य सोचें कि पहले समय में इतने सारे प्रयोगों के बिना भी जीवन बहुत सुखी और आनंदित था आज के समय में इतनी सारी जानकारी और सावधानियों के बावजूद भी समस्याएं हल क्यों नहीं होती | जीवन को सरल बनाने के लिए अधिक प्रयोगों के आवश्यकता नहीं है बल्कि ऐसे उपाय की आवश्यकता है जो बिना किसी हानि के समस्या को जड़ से समाप्त करे और परिस्थितियाँ अनुकूल करे |

किसी भी व्यक्ति द्वारा आवश्यकता से अधिक प्रयोगों को करना अपनी समस्या को अधिक गंभीर करना है इसलिए कभी भी तर्कहीन या सुने सुनाए प्रयोग ना करें लाभ पाने के लिए सदैव विज्ञान और तर्क आधारित उपाय ही करें | कुदृष्टि, जादू-टोना, प्रेतात्मा इत्यादि के लक्षण तो सभी लोगों को पता होते है इन समस्यायों के लिए तर्कहीन या सुनेसुनाये प्रयोग करना नकारात्मक शक्तियों को अधिक बल देना है |

क्या आप जानते है कि घर और आफिस में यंत्रों को रखने से निकलती है नकारात्मक ऊर्जा !

ऐसा माना जाता है कि यंत्र का प्रयोग किसी विशेष कार्य को पूर्ण होने या इच्छा की सिद्धि के लिए किया जाता है | सभी प्रकार के यंत्रों पर इच्छित कार्य के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के आकार बने होते है जिनकी अपनी ऊर्जा शक्ति होती है | यंत्रों पर भिन्न-भिन्न अक्षर या अक्षरों से शब्द अथवा वाक्य/मंत्र होते है, सभी अक्षरों का अपना-अपना वास्तविक ध्वनी कम्पन होता है | ध्वनी कम्पन से विशेष तरंगें निकलती है जो किसी इच्छा सिद्धि के लिए बहुत अधिक सहायक होती है |

यंत्रों में धातु और रंगों का भी प्रयोग होता है, प्रत्येक धातु का अपना बल प्रभाव होता है इसी प्रकार सभी रंगों का भी अपना सांसारिक महत्त्व है | किसी यंत्र के निर्माण के लिए आकर, रेखाचित्र, अक्षर, धातु और रंग आवश्यक होते है | बिंदु, रेखा, त्रिकोण, चतुर्भुज, पंचभुज, षष्टकोण, सप्तकोण, अष्टकोण, घेरा इत्यादि का आपस में समानता नहीं है इसलिए इनका प्रभाव भी सामान नहीं है | इसी प्रकार सभी अक्षरों का ध्वनी कम्पन भी एक दूसरे से भिन्न है |

यंत्रों का अधिकतम प्रयोग धन के लिए, बीमारी से छुटकारा पाने के लिए, अकारण परेशानियों से मुक्ति के लिए और भूत प्रेत व नकारात्मकता से बचने के लिए किया जाता है | कुछ लोग यंत्रों को गले या अंगूठी में भी धारण कर लेते है |  सकारात्मक फल की इच्छा से रखे गए यंत्र का नकारात्मक प्रभाव भी होता है क्योंकि प्रकृति का नियम है कि संसार की सभी वस्तुओं का प्रभाव सकारात्मक और नकारात्मक दोनो ही प्रकार का होता है | यह अलग बात है कि व्यक्ति केवल लाभ को ही देखता है |

एक कार्य के लिए दो या उससे अधिक भिन्न – भिन्न प्रकार के यंत्रों को रखने से उनकी ऊर्जा शक्ति,  ध्वनी कम्पन और बल आपस में टकराने के कारण नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है जिससे कार्यों में सफलता नहीं मिलती बल्कि रुकावट होती है | एक स्थान पर अनेकों यंत्रों की ऊर्जा शक्ति के प्रभाव से व्यक्ति के निजी सुखों पर नकारात्मक पड़ता है | अनेकों प्रकार की ऊर्जाओं से उत्पन्न नकारात्मकता भूत-प्रेत इत्यादि दुष्ट शक्तियों का प्रभाव भी अधिक करती है |  किसी भी प्रकार के यंत्र और उच्चारण किए मन्त्र या जाप शब्द का आपस में मेल नहीं होने से भी यंत्रों से नकारात्मक ऊर्जा निकलती है |

क्या आप जानते है कि मंत्रों का भी होता है नकारात्मक प्रभाव !

कुछ लोग बिना किसी लक्ष्य के कोई मंत्रजाप अथवा पूजा को सालों तक करते रहते है | इस बात का उन्हें स्वयं भी पता नहीं होता है कि किस मंत्र, नाम या पाठ-पूजा को कितने समय के बाद नहीं करना चाहिए या उसे विराम देना अति आवश्यक है | सभी लोग यह जानते है कि कोई भी मंत्र, नाम, पाठ इत्यादि उच्चारण करने से विशेष प्रकार की ऊर्जा का प्रवाह होता है परन्तु लगभग सभी लोगों को यह ज्ञान नहीं है कि मंत्र, नाम इत्यादि पढने से जो ऊर्जा बनती है उसका सकारात्मक प्रयोग कैसे किया जाता है |

किसी मंत्रजाप से उत्पन्न हुई ऊर्जा का सकारात्मक प्रयोग नहीं कर पाने के कारण ही उसका नकारात्मक प्रभाव मंत्रजाप करने वाले व्यक्ति और उसके घर पर पड़ता है जिसका पहला मुख्य लक्षण गुस्सा आना और अशांति होना है | मंत्रजाप से पहले लक्ष्य होना और मंत्रजाप से बाद यह पता ज्ञान आवश्यक है कि इस ऊर्जा का सकारात्मक कैसे और कहाँ करना है अन्यथा मंत्रजाप से किसी बड़ी हानि होने की संभावना भी होती है क्योंकि आवश्यकता से अधिक उत्पन्न ऊर्जा पारिवारिक सुखों से वंचित करने में सक्षम होती है |

इस बात का ज्ञान भी सभी को नहीं है कि नकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह अधिक होने पर बुरी नज़र, टोना टोटका, भूत प्रेत इत्यादि को अधिक बल मिलता है | लोगों को ईश्वर से यह शिकायत भी रहती है कि अधिक मंत्रजाप या पूजा पाठ करके भी नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव समाप्त नहीं होता है | इस बात पर सभी को विशेष ध्यान देना चाहिए कि दैनिक क्रियाओं में कैसे कर्म करना चाहिए और कैसे कर्म नहीं करना चाहिए | कहीं ऐसा तो नहीं कि मंत्रजाप या पाठ-पूजा करने से ही समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं |

ऐसा प्रचलित है कि प्रत्येक मंत्र उच्चारण का अपना एक प्रभाव होता है जिससे वायुमंडल में सकारात्मक मंत्रशक्ति सक्रिय हो जाती है जिससे इच्छित फल की प्राप्ति होती है | ऐसी धारणा है कि सही उच्चारण से मंत्र का नकारात्मक प्रभाव कभी नही होता परन्तु यह पूर्ण सत्य नहीं है | जब व्यक्ति समस्याओं से घिरा होता है तो वह जगह-जगह जाकर उपाय पूछता है जिसके लिए उसे कोई मंत्र दिया जाता है कि इसका जाप करने से समस्याओं का अंत होगा और जीवन में सुख-समृद्धि आएगी | मंत्रशक्ति के सक्रियता के कारण मंत्र का उच्चारण करने वाले अधिकतर लोग स्वयं और आसपास के माहौल में सकारात्मकता का अनुभव भी करते है |

व्यक्ति द्वारा मंत्रों से स्वयं उत्पन्न की गयी मंत्रशक्ति में सकारात्मक प्रभाव के साथ-साथ मंत्र का नकारात्मक प्रभाव भी होता है परन्तु साधारण व्यक्ति को मंत्रों की नकारात्मकता के बारे में ज्ञान नहीं है | संसार के कुछ ही लोगों को यह ज्ञान है कि मंत्रो का नकारात्मक प्रभाव भी होता है | मंत्रों के अधिक उच्चारण से व्यक्ति की समस्या समाप्त होने के स्थान पर एक और नयी समस्या उत्पन्न हो जाती है | मंत्रों का उच्चारण लाखों वर्षों से हो रहा है फिर भी पुराने समय की तुलना में आज के समय में व्यक्ति की समस्याएं और दुविधाएं पहले से कई गुना अधिक है | यदि मंत्रों का केवल सकारात्मक प्रभाव ही होता तो बीते लाखों वर्षों में मनुष्यों द्वारा किए गए मंत्रो के उच्चारण से वायुमंडल में मंत्रशक्ति इतनी सक्रीय होती कि संसार के किसी व्यक्ति को कोई समस्या ही नहीं होती |

किसी मंत्र द्वारा किसी वस्तु को प्राप्त करने के साथ-साथ किसी दूसरी प्राप्त वस्तु की हानि होना निश्चित है | एक वस्तु को पाने के लिए उच्चारण किया गया मंत्र दूसरी वस्तु का अंत करता है क्योंकि मंत्रशक्ति सकारात्मक भी है और नकारात्मक भी है | किसी भी मंत्र का उच्चारण करने से पहले व्यक्ति को किसी सांसारिक सुख की हानि सहने के लिए तैयार रहना चाहिए |

किसी जीवित या मृत व्यक्ति का नाम बार-बार लेने से भी एक प्रकार की ऊर्जा उत्पन्न होती है जिससे लाभ और हानि दोनों होते है | जिस व्यक्ति का नाम लिया गया है उसके विचार,  गुण-अवगुण, रहन-सहन और उस पर सांसारिक प्रभाव, उसका नाम लेने वाले पर भी होता है | सांसारिक सुखों की प्राप्ति के लिए ऐसे व्यक्ति के नाम का उच्चारण नहीं करना चाहिए जिसका स्वयं का जीवन संघर्षमयी हो |

सूर्य की ऊर्जा पृथ्वी के वातावरण के कारण लाभकारी है परन्तु इसकी ऊर्जा की अधिकता में भस्म करने की क्षमता है, इसी प्रकार मंत्र उच्चारण की अधिकता में सांसारिक सुखों की हानि करने की क्षमता है | जिस मंत्र के उच्चारण में लाभ का स्वार्थ होगा उसमे हानि अवश्य होगी |

ऐसे मंत्रजाप आजीवन हानि का कारण बनते है :   

  • लक्ष्यहीन मंत्रजाप और पाठ पूजा करना |
  • मंत्रजाप वाले स्थान पर नकारामक शक्ति का प्रभाव होना |

कुछ लोग बिना किसी लक्ष्य के कोई मंत्रजाप अथवा पूजा को सालों तक करते रहते है | इस बात का उन्हें स्वयं भी पता नहीं होता है कि किस मंत्र, नाम या पाठ-पूजा को कितने समय के बाद नहीं करना चाहिए या उसे विराम देना अति आवश्यक है | सभी लोग यह जानते है कि कोई भी मंत्र, नाम, पाठ इत्यादि उच्चारण करने से ऊर्जा का प्रवाह होता है परन्तु लगभग सभी लोगों को यह ज्ञान नहीं है कि मंत्र, नाम इत्यादि पढने से जो ऊर्जा बनती है उसका सकारात्मक प्रयोग कैसे किया जाता है | किसी मंत्रजाप से उत्पन्न हुई ऊर्जा का सकारात्मक प्रयोग नहीं कर पाने के कारण ही उसका नकारात्मक प्रभाव मंत्रजाप करने वाले व्यक्ति और उसके घर पर पड़ता है जिसका पहला मुख्य लक्षण गुस्सा आना और अशांति होना है |

मंत्रजाप से पहले लक्ष्य होना और मंत्रजाप से बाद इसकी ऊर्जा का सकारात्मक प्रयोग पता होना अति आवश्यक है अन्यथा मंत्रजाप से किसी बड़ी हानि होने की संभावना भी होती है क्योंकि आवश्यकता से अधिक मंत्रजाप से उत्पन्न ऊर्जा, पारिवारिक सुख से वंचित करने में सक्षम होती है |

इस बात का ज्ञान भी सभी को नहीं है कि नकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होने पर बुरी नज़र, टोना टोटका, भूत प्रेत इत्यादि को अधिक बल मिलता है | लोगों को ईश्वर से यह शिकायत भी रहती है कि अधिक मंत्रजाप या पूजा पाठ करके भी नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव समाप्त नहीं होता है |

इस बात पर सभी को विशेष ध्यान देना चाहिए कि दैनिक क्रियाओं में कैसे कर्म करना चाहिए और कैसे कर्म नहीं करना चाहिए | कहीं ऐसा तो नहीं कि मंत्रजाप या पाठ-पूजा के कारण ही समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं |

मंत्रघात से हानि !

Napoo foundation के शोध में मंत्रघात ऐसा विषय है जिसका ज्ञान संसार के अधिकतर लोगों को नहीं है | सभी लोग बुरी नज़र, जादू-टोना, भूत-प्रेत, नकारात्मकता इत्यादि के बारे में जानते है परन्तु लोगों को अभी तक मंत्रघात बारे में जानकारी ही नहीं है क्योंकि मंत्रघात इन सबसे भिन्न व अधिक रहस्यमयी है और इसकी जानकारी पुस्तकों में और इन्टरनेट पर उपलब्ध नहीं है | मंत्रघात अति प्रभावशाली होने पर भी प्रचलित नहीं है क्योंकि इसका प्रयोग साधारण व्यक्ति अनजाने में गुप्त तरीके से कर देता है | पिछले अनेकों वर्षों से Napoo फाउंडेशन अदृश्य संसार पर काम कर रहा  है और अपनी शोध की हुई बहुत सारी रहस्यमयी जानकारी को Napoo healing course के माध्यम से जिज्ञासु लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया है | जब किसी व्यक्ति को ऐसे लक्षण हो जो ना तो बुरी नज़र है, ना ही किसी जादू-टोने का प्रभाव से है और जो भूत प्रेत इत्यादि के कारण से भी नहीं है तब यह मंत्रघात होने का लक्षण होता है और मंत्रघात केवल हानि करती है |

  • मंत्रघात अनजाने में ही क्यों और कैसे होता है ?
  • मंत्रघात होने पर क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए ?

मंत्रघात ऐसी नकारात्मक शक्ति है जो व्यक्ति की इच्छा और लक्ष्य के कारण सकारात्मक मंत्रों द्वारा उत्पन्न होती है और यह केवल हानि करती है इसमें एक मुख्य बात यह भी है कि इसका प्रयोग अधिकतर लोग ज्ञान की कमी के कारण अनजाने में ही करते है और यह रहस्य समझने कि आवश्यकता है कि अनजाने में हुए मंत्रघात से व्यक्ति को स्वयं भी उतनी ही हानि होती है जितनी हानि दूसरों को होती है |

इसके कारण जीवन में अकारण समस्याएं और नकारात्मकता का सामना करना पड़ता है | मंत्रघात अति गुप्त विज्ञान है जिसके बारे में अधिकतर लोगो को ज्ञान नहीं है क्योंकि यह कोई ज्योतिषीय या तांत्रिक मंत्र, विधि या उपाय नहीं है इसी कारण प्रचलित उपाय, मंत्र, विधि, टोटकों इत्यादि से कोई भी लाभ नहीं मिलता | किसी समस्या के लिए व्यक्ति द्वारा किए गए अधिकतर मंत्र और उपाय इसलिए भी निष्फल हो जाते है क्योंकि मंत्रघात के प्रभाव को समाप्त करने और इससे बचने के लिए युति का सटीक ज्ञान अधिकतर लोगों को नहीं है | मंत्रघात से हो रही हानि से बचने के लिए सटीक ज्ञान और अति गोपनीयता से कार्य करने की आवश्यक है |

मंत्रघात के मुख्य लक्षण :

  • किसी भी मंत्र के उच्चारण से नकारात्मकता और समस्याओं का बढना
  • मुख से निकली सभी प्रकार की नकारात्मक बातों का सच हो जाना
  • धार्मिक क्रियाओं और पुण्य कर्मों का बिलकुल भी लाभ नहीं मिलना
  • किसी का कोई रोग या पीड़ा सुनकर, वही समस्या स्वयं को हो जाना

मंत्रघात के लक्षण होने पर इसके प्रभाव को अति शीघ्र समाप्त करना आवश्यक है क्योंकि इसका प्रभाव सभी प्रकार के सांसारिक सुखों से वंचित रखता है | सभी टोने टोटके गोपनीय तरीके से किए जाते है इसलिए इनसे बचने के लिए सभी उपचार क्रियाएं गोपनीय होनी चाहिए अन्यथा लाभ नहीं मिलता

भाग – ३

Napoo पंचतत्वों पर आधारित आध्यात्मिक पद्धति है और पिछले कई वर्षों में इसके शत प्रतिशत सकारात्मक परिणाम देखे गए है जिससे यह सिद्ध होता है कि ऐसी कोई भी नकारात्मक शक्ति का प्रभाव नहीं है जो Napoo तात्विक पद्धति द्वारा समाप्त नहीं हो सकता | नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव भी अन्य बीमारी की तरह ही है, जैसे किसी बीमारी में दवा लेने से आराम मिलता है वैसे ही Napoo पद्धति से इच्छित परिणाम मिलते है |

नकारात्मक शक्तियों से सम्बंधित उपचार/विधि/उपाय करने से पहले इस बात को समझना बहुत ही आवश्यक है कि समस्या का समाधान, नकारात्मक शक्ति द्वारा उत्पन्न हुई हानि, पीड़ा और परिस्थिति के आधार पर ही होता है | Napoo foundation इस बात का दावा नहीं करता है कि कुछ घंटों में सभी नकारात्मक शक्तियों से छुटकारा मिल जायेगा | Napoo पद्धति के नियमों का विधिवत पालन करने से १००% लाभ मिलना निश्चित है |

इस बात को सदैव याद रखें कि Napoo पद्धति के तत्वों का सिद्धांत समझे बिना किसी भी नकारात्मक शक्ति द्वारा उत्पन्न हुई समस्या के लिए कोई एक या एक से अधिक तत्व (पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु, आकाश) का प्रयोग करके शरीर के पंचतत्वों से छेड़छाड़ करना अपनी समस्या को अधिक बलवान करना है, जिसके परिणाम अति गंभीर हो सकते है |

 

Napoo नियम

सर्वप्रथम नापू चिन्ह का प्रयोग करना आवश्यक है | Napoo Foundation से Napoo चिन्ह निशुल्क लेकर इसे  अपने घर, दूकान, फैक्ट्री, इत्यादि स्थानों पर लगायें | 

लोगों की बुरी नज़र से बचने के लिए Napoo चिन्ह को घर के मुख्य द्वार पर लगायें |

घर में सुख - शांति के लिए Napoo चिन्ह को ड्राइंग रूम में लगायें |

निजी संबंधों में सुधार के लिए Napoo चिन्ह को बेड रूम में लगायें |

बच्चों की सुरक्षा के लिए Napoo चिन्ह बच्चों के कमरे में लगायें |

कारोबार में तरक्की के लिए Napoo चिन्ह को कार्यस्थल पर लगायें |

Napoo healing सावधानियां:

  1. हाथों में कोई अंगूठी या गले में कोई धागा, ताबीज पहनना वर्जित है |
  2. Napoo तत्व उपचार करते समय कोई अन्य उपाय करना वर्जित है |
  3. सम्पूर्ण सुरक्षा के लिए घर में कोई अन्य यंत्र रखना और मंत्र पढ़ना वर्जित है |
  4. Napoo उपचार पद्धति गुप्त रखें और किसी को ना बताएं
  5. नकारात्मक शक्तियों से सम्बंधित समस्याओं के लिए किसी व्यक्ति को कोई भी उपाय ना बताएं अन्यथा आपको अकारण समस्या का सामना करना पड़ेगा |

समस्याओं के आधार पर Napoo तात्विक पद्धति सीखने के लिए हमारे कार्यालय से संपर्क करें |

विशेष: Napoo Foundation की सेवाओं का लाभ उठाने के लिए व्यक्तिगत रूप से संपर्क करे |